बेबाक · Editorial
बीस सांसद, एक विलय और दल-बदल विरोधी कानून का खुला द्वार
अयोग्यता पर लटके सवालों के बीच बीस लोकसभा सदस्यों के एक गुट ने विलय का मार्ग चुना; दल-बदल विरोधी कानून के इस अपवाद को अब एक ईमानदार सुधार की दरकार है।
बंगाल में उथल-पुथल
शुरुआत शोर-शराबे से नहीं, बल्कि तथ्यों से करते हैं। तृणमूल के बीस बागी लोकसभा सदस्यों ने स्पीकर से मिलकर अपना कदम दर्ज कराने के बाद 'फिलहाल' एक पंजीकृत क्षेत्रीय दल, 'नेशनलिस्ट सिटिजन पार्टी ऑफ इंडिया' में विलय कर लिया है। इस फैसले के इर्द-गिर्द एक परिचित राजनीतिक तूफान उमड़ रहा है: पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और कई तृणमूल नेताओं को कथित भ्रामक और मानहानिकारक टिप्पणियों के खिलाफ भेजा गया 'सीज-एंड-डेसिस्ट' नोटिस; सदन की कार्यवाही के दौरान कथित तौर पर बार-बार मौखिक दुर्व्यवहार और स्त्रीद्वेषी आचरण के लिए एक सहयोगी के निष्कासन की मांग को लेकर स्पीकर को लिखा गया पत्र; पूर्व मुख्यमंत्री के आवास के बाहर कुणाल घोष पर कथित तौर पर फेंका गया अंडा; और पश्चिम बंगाल में एक महीने पुरानी राज्य सरकार द्वारा मूर्तियों को गिराया जाना तथा कोलकाता का रंग-रूप बदला जाना। यह राजनीतिक तमाशा बेहद मुखर है। लेकिन इसके नेपथ्य में छिपा संवैधानिक प्रश्न कहीं अधिक शांत है, और वही सबसे ज्यादा मायने रखता है।
जनादेश बनाम पलायन
संसद का एक सदस्य उस जनादेश के आधार पर अपनी सीट धारण करता है जो मतदाता ने उसे सौंपा है, न कि यह कोई निजी संपत्ति है जिसे कहीं भी ले जाया जा सके। दल-बदल विरोधी ढांचा इसी जनादेश की रक्षा के लिए मौजूद है: जो विधायक या सांसद उस मंच को छोड़ देता है जिस पर वह चुना गया था, उसे अयोग्यता का सामना करना पड़ सकता है। लेकिन कानून 'विलय' के मार्ग को भी मान्यता देता है, इस तर्क पर कि एक वास्तविक राजनीतिक पुनर्गठन किसी व्यक्ति विशेष के विश्वासघात के समान नहीं है। यही मार्ग इस पूरे प्रकरण की धुरी है। जब कोई गुट इस तरह से विलय करता है कि अयोग्यता पर कोई फैसला आने से पहले ही उसके वोटों की गिनती हो सके, तो पुनर्गठन को समायोजित करने के लिए लिखे गए प्रावधान पर एक भारी संवैधानिक बोझ डाल दिया जाता है। यह वह तनाव है जिसका समाधान एक गणतंत्र को अवश्य करना चाहिए।
दोनों पक्षों के मजबूत तर्क
असंतुष्टों के सबसे मजबूत तर्कों को सुनें। एक जनप्रतिनिधि कोई जागीर या संपत्ति नहीं है; यदि सदस्य आंतरिक लोकतंत्र के पतन को रेखांकित करते हैं — जिसमें स्पीकर को दी गई एक लिखित शिकायत में सदन की कार्यवाही के दौरान कथित तौर पर बार-बार मौखिक दुर्व्यवहार और स्त्रीद्वेषी आचरण का जिक्र है — तो पार्टी छोड़ने को अवसरवाद के बजाय अंतरात्मा की आवाज के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है, और एक दुर्व्यवहारपूर्ण राजनीतिक घर को छोड़ने की स्वतंत्रता अपने आप में एक लोकतांत्रिक मूल्य है। अब दूसरे पक्ष के मजबूत तर्कों पर गौर करें। मंशा को समय (timing) के चश्मे से पढ़ा जाता है। यह विलय मानसून सत्र से ठीक पहले हुआ है, जब केंद्र सरकार 'परिसीमन विधेयक' ला सकती है, और ऐसी खबरें हैं कि इस गुट ने एनडीए को समर्थन का वादा किया है। अयोग्यता के प्रश्न पर कोई फैसला आने से पहले ही एक वोट को सुरक्षित कर लेना, सुनियोजित तरीके से जवाबदेही को टालने जैसा लग सकता है। दोनों ही दृष्टिकोणों को निष्पक्षता से सुना जाना चाहिए; किसी को भी सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता।
दस्तावेज़ क्या दर्शाते हैं
लफ्फाजी को किनारे रखकर दस्तावेजों का मूल्यांकन करें। लोकसभा के बीस सदस्यों ने 'फिलहाल' — एक ऐसा शब्द जो स्वयं इसकी अस्थायी प्रकृति को दर्शाता है — 'नेशनलिस्ट सिटिजन पार्टी ऑफ इंडिया' के साथ विलय किया है, यह वही पार्टी है जिसके बारे में कहा जाता है कि उसने त्रिपुरा चुनावों में 'राजनीतिक दल-बदलुओं को खारिज करें' के बैनर तले प्रचार किया था। खबरों में इस कदम को मानसून सत्र और परिसीमन जैसे महत्वपूर्ण विधेयक से जोड़ा जा रहा है, जबकि अभी तक अयोग्यता के किसी भी फैसले ने इन सदस्यों की स्थिति स्पष्ट नहीं की है। इसके विपरीत, इस बात पर विचार करें कि इसी दौर में सर्वोच्च न्यायालय ने क्या पुष्ट किया है: हरियाणा सरकार द्वारा लगभग चार दशक पहले अधिग्रहित की गई भूमि (पंचकूला में सेक्टर 24 से 28 के लिए 1,500 एकड़ से अधिक) से जुड़े एक मामले में, न्यायालय ने यह ठहराया कि कोई भी सरकार या कोई भी एकमुश्त समझौता किसी नागरिक के अदालत जाने के अधिकार को कम नहीं कर सकता। जिस जवाबदेही से किसी नागरिक को वंचित नहीं किया जा सकता, उसे राजनीतिक वर्ग द्वारा प्रक्रियात्मक दांव-पेंच से टालने की अनुमति नहीं होनी चाहिए।
निर्णय
खिलाड़ियों को नहीं, बल्कि कानून और संस्था को परखें। पुनर्गठन के लिए तैयार किया गया विलय का अपवाद अब एक परिक्रामी द्वार की तरह काम करने का जोखिम उठा रहा है — अपनी पार्टी को छोड़ते हुए भी अपना वोट सुरक्षित रखने का एक जरिया। और अयोग्यता तय करने का अधिकार जिस कार्यालय में निहित है, यानी स्पीकर का पद, वह एक ऐसी घड़ी थामे हुए है जिसका सामरिक समय-निर्धारण द्वारा फायदा उठाया जा सकता है, क्योंकि जब तक याचिका पर फैसला नहीं होता, तब तक सदस्य मतदान कर सकता है। जब परिसीमन जैसे दूरगामी विधेयक का परिणाम उन सदस्यों द्वारा तय किया जा सकता हो जिनकी सदन में स्थिति ही अनिर्णीत है, तो मतदान की वैधता एक तकनीकी खामी की भेंट चढ़ जाती है। यह किसी एक पार्टी के चरित्र की विफलता नहीं है; यह एक संरचनात्मक खामी है जिसका फायदा कोई भी गुट, किसी भी रंग का हो, तब तक उठा सकता है जब तक कि इसे बंद नहीं कर दिया जाता। दोष इसके ढांचे में ही है।
रास्ता बंद करने का उपाय
इसका समाधान संस्थागत है, और यह पहुंच के भीतर है। पहला, विलय के अपवाद को सख्त किया जाना चाहिए ताकि एक 'विलय' टिकाऊ और ठोस हो — न कि 'फिलहाल' घोषित की गई कोई अस्थायी पार्किंग व्यवस्था — और इस दावे को साबित करने का भार कि पुनर्गठन वास्तविक है, इसे करने वालों पर ही होना चाहिए। दूसरा, अयोग्यता की याचिकाओं को एक निश्चित समय-सीमा में बांधा जाना चाहिए, जिनका फैसला महीनों के भीतर हो, और इससे भी बेहतर यह होगा कि यह फैसला किसी ऐसे पीठासीन अधिकारी के बजाय, जो शायद ही कभी राजनीतिक खींचतान से ऊपर होता है, एक स्वतंत्र न्यायाधिकरण (tribunal) द्वारा किया जाए। तीसरा, जब तक सुधार नहीं हो जाता, स्पीकर कार्यालय को विवादास्पद विधेयकों पर विचार करने से पहले लंबित याचिकाओं पर अपना निर्णय देना चाहिए, ताकि परिसीमन या किसी अन्य उपाय पर कोई भी वोट किसी अनिर्णीत सीट पर निर्भर न रहे। जनादेश मतदाता का होता है। कानून को इसे हस्तांतरणीय संपत्ति मानना बंद करना होगा।
जो विलय किसी वैचारिक एकता के बजाय महज एक वोट को सुरक्षित करने के उद्देश्य से गढ़ा गया प्रतीत होता है, वह वास्तव में गठबंधन के वेश में जवाबदेही से पलायन है।
At stake is whether voters' mandates are protected equally when MPs invoke the anti-defection merger exception before disqualification questions are decided.
Tenth Schedule Merger Clock
Parliament should amend the Tenth Schedule and Lok Sabha rules to require the Speaker to publish merger claims, supporting documents and pending disqualification petitions within seven days, and decide them by a reasoned order within 30 days. Until that order, MPs invoking the merger exception should be marked as under anti-defection review for all recorded votes on constitutional or electoral Bills, so citizens can see whether a mandate-sensitive vote was cast before legal standing was settled.
आपके संवैधानिक अधिकार
इस कहानी में संविधान क्या गारंटी देता हैSuperintendence, direction and control of elections vests in an independent Election Commission of India.
ConstitutionalEvery citizen aged 18 or above has the right to vote, regardless of wealth, status, gender or education.
ConstitutionalEvery citizen has the right to freedom of speech and expression — including a free press and the right to know — subject only to the reasonable restrictions in Article 19(2).
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