बेबाक · Editorial
जब भारतीय सुदूर युद्धों में फँसें, तो राज्य का कर्तव्य भी उनके साथ चलना चाहिए
रूस-यूक्रेन युद्ध से प्रभावित परिवारों पर सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश एक ऐसी कांसुलर प्रणाली की आवश्यकता को उजागर करता है, जिसकी पहुँच हर खतरे वाले क्षेत्र में प्रत्येक नागरिक तक होनी चाहिए।
सरहदों के पार
एक ही समाचार चक्र के भीतर, विदेशों में भारतीयों की भेद्यता एक से अधिक रूपों में सामने आई है। सर्वोच्च न्यायालय ने विदेश मंत्रालय से रूस-यूक्रेन युद्ध में मारे गए या लापता नागरिकों के परिवारों के लिए एक नोडल अधिकारी नियुक्त करने को कहा है, ताकि वे रूसी दूतावास के समक्ष मुआवजे का दावा दायर कर सकें, और उन्हें स्थानीय भाषाओं में प्रासंगिक जानकारी और अपडेट प्रदान किया जा सके। अलग से, मर्चेंट नाविक राम चंद्र, जो पिछले साल सितंबर में ड्यूटी पर जाने के बाद अपने दूसरे विदेशी असाइनमेंट पर थे, एक यूक्रेनी जहाज पर ड्रोन हमले के बाद लापता हो गए। प्रत्येक मामले में, दूरी ने राज्य की पहुँच की परीक्षा ली, और यह दिखाया कि केवल कामचलाऊ व्यवस्था ही पर्याप्त नहीं है।
मुख्य द्वंद्व
सरकार का अधिकार क्षेत्र क्षेत्रीय होता है; उसके नागरिक नहीं। जैसे ही कोई भारतीय किसी युद्ध-क्षेत्र के कार्यबल में शामिल होता है या संघर्ष के जोखिम वाले जहाज पर सेवा करता है, सुरक्षा का सामान्य तंत्र कांसुलर चैनलों और आधिकारिक संचार तक सिमट जाता है। यह द्वंद्व वास्तविक है: केंद्र सरकार न तो यूक्रेन के युद्धक्षेत्र में पुलिसिंग कर सकती है, न ही हर विदेशी असाइनमेंट की सुरक्षा की गारंटी दे सकती है। फिर भी, जो पासपोर्ट वह जारी करती है, वह गरिमा और आश्रय का वचन है। संप्रभुता की सीमाओं और नागरिकता के दायित्व के बीच का यही वह सटीक स्थान है, जिसे सर्वोच्च न्यायालय ने अब कार्यपालिका को भावनाओं के बजाय एक व्यवस्थित कार्यप्रणाली के साथ भरने के लिए कहा है।
दोनों पक्षों का तर्कपूर्ण आकलन
संयम बरतने के पक्ष को भी उचित रूप से सुना जाना चाहिए। विदेशी मुआवजा व्यवस्था, दूतावास की प्रक्रियाएं और संघर्ष-क्षेत्र से वापसी मुख्य रूप से नई दिल्ली के नियंत्रण से बाहर हैं; शोक संतप्त परिवारों से बड़े-बड़े वादे करना अपने आप में एक क्रूरता होगी। विदेश मंत्रालय को अपने सीमित कांसुलर संसाधनों का उपयोग उन संकटों के बीच समझदारी से करना चाहिए जो बिना किसी चेतावनी के उत्पन्न होते हैं, चाहे वह यूक्रेनी जहाज हो या कोई अन्य विदेशी आपातकाल। इसके विपरीत नागरिक का दावा भी है: विदेशी प्रक्रियाओं या अंग्रेजी की आधिकारिक भाषा से अपरिचित एक शोकाकुल परिवार अकेले दूतावास के दावों की प्रक्रियाओं को नहीं सुलझा सकता। नोडल अधिकारी और स्थानीय भाषाओं में अपडेट पर अदालत का जोर इसी असमानता का सटीक उत्तर है। दोनों में से कोई भी प्रवृत्ति निरर्थक नहीं है; सवाल यह है कि नागरिक की भलाई तदर्थ सद्भावना में है या एक स्थायी प्रणाली में।
कर्तव्य का प्रमाण
विशिष्ट तथ्य एक ही दिशा की ओर इशारा करते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने किसी असीमित बचाव अभियान की मांग नहीं की; उसने एक नोडल अधिकारी, रूसी दूतावास के समक्ष दावा दायर करने में सहायता, और उन भाषाओं में जानकारी की मांग की जिन्हें परिवार वास्तव में पढ़ सकते हैं — यह एक प्रबंधकीय कदम है, कोई काल्पनिक आदर्श नहीं। भारत की क्षमता अन्य जगहों पर भी सिद्ध हो चुकी है: भारतीय दूतावास की रिपोर्ट के अनुसार, भूकंप के बाद की पुनर्निर्माण सहायता के तहत नेपाल के आठ जिलों में 30 सांस्कृतिक विरासत स्थलों के संरक्षण में सहयोग दिया जा रहा है। एक राज्य जो विदेशों में इतने सुव्यवस्थित काम को कायम रख सकता है, वह अपने ही संकटग्रस्त नागरिकों के लिए एक स्पष्ट कांसुलर मार्ग भी तैयार कर सकता है। ब्रॉड पीक हिमस्खलन, जहाँ चार शव बरामद किए गए हैं और ओमान की नधीरा अल हार्थी तथा नेपाल के पुर बहादुर गुरुंग की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि नेपाल के निर्मल पुर्जा सहित छह लापता बताए गए हैं, इस बात की याद दिलाता है कि सुदूर खतरे कितनी जल्दी मानवीय संकट बन जाते हैं।
निष्कर्ष
चिंता का विषय द्वेष नहीं बल्कि भटकाव है। विदेशी युद्धों और आपदाओं में नागरिकों के प्रति भारत की कांसुलर प्रतिक्रिया अक्सर किसी स्पष्ट स्थायी प्रोटोकॉल के बजाय अदालत के हस्तक्षेप या समाचारों के दबाव से जुड़ी रहती है। यह निर्देश इसलिए स्वागत योग्य है क्योंकि यह सहानुभूति को एक प्रक्रिया में बदल देता है: एक नामित अधिकारी जिससे संपर्क किया जा सके, एक दावा प्रक्रिया जिसे परिवार आसानी से समझ सकें, और उन भाषाओं में संचार जिन्हें वे समझते हैं। लेकिन एक ही संघर्ष के लिए एक ही आदेश कोई नीति नहीं है। एक लापता नाविक और युद्ध मुआवजे के दावे का सबक एक ही है — भारतीय दुनिया भर के जोखिमों में फैले हुए हैं, और जो तंत्र उनके साथ चलता है, उसे स्थायी होना चाहिए, न कि ऐसा जिसे मुकदमेबाजी द्वारा बुलाया जाए।
आगे की राह
विदेश मंत्रालय को चाहिए कि वह उस व्यवस्था को संस्थागत रूप दे, जिसका आदेश अदालत ने एक युद्ध के लिए दिया है, ताकि इसे भविष्य के समान संकटों के लिए एक स्थायी ढांचे में बदला जा सके। एक स्थायी संकट-कांसुलर सेल, संघर्ष से जुड़े मामलों के लिए नियुक्त किए जा सकने वाले नोडल अधिकारी, प्रभावित परिवारों के साथ उनकी स्थानीय भाषा में अनिवार्य संवाद, और दूतावास के दावों में सहायता — ये ऐसे कदम हैं जो बुनियादी कर्तव्यों को सुनिश्चित करने के लिए अदालतों पर निर्भरता को कम करेंगे। जहाँ विदेशी रोजगार या समुद्री तैनाती भारतीयों को खतरे के करीब ले जाती है, वहाँ भर्ती करने वालों और एजेंटों के लिए यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि वे आधिकारिक उपयोग के लिए विश्वसनीय परिवार-संपर्क और तैनाती के रिकॉर्ड बनाए रखें। इनमें से किसी भी कदम के लिए विदेशी धरती पर नई संप्रभुता की मांग नहीं की जा रही है; यह केवल यह मांग करता है कि राज्य खुद को एक स्पष्ट तथ्य के इर्द-गिर्द व्यवस्थित करे — सीमा पार करने वाला नागरिक राज्य की देखभाल के दायरे से बाहर नहीं जाता।
पासपोर्ट एक वचन है; इसे जारी करने वाला राज्य उस क्षण मौन नहीं हो सकता, जब उसका धारक किसी सरहद को पार करता है।
आपके संवैधानिक अधिकार
इस कहानी में संविधान क्या गारंटी देता हैTraffic in human beings, begar and other forms of forced labour are prohibited.
Fundamental RightThe State shall make provision for just and humane conditions of work and for maternity relief.
Directive PrincipleThe State shall, within its capacity, secure the right to work, education and public assistance in cases of unemployment, old age, sickness and disablement.
Directive PrincipleThe State shall take steps to separate the judiciary from the executive in the public services.
Directive PrincipleWhat this editorial rests on
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